Language of sexuality
Dec 2010 05

The language of sexuality that we use at The YP Foundation has evolved over the last few years as our understanding of what the multiple facets of and interconnections within sexuality, gender, rights and health are. It’s been a challenging process and our knowledge of the same has been challenged, redefined, questioned and re-invented. The most important learning principle is that there is little that is static. Our key principles remain the same, but how those are defined and applied is a continuous learning process.

Over the last 2 years our work has been directed towards advocating for young people’s sexual right as a human right. Certain key principles that have been recognized are:

- We believe that sexuality and expression of sexuality is intrinsic to each individual

- Recognize that sexuality is a normal and important part of all people’s lives and while different people have different understandings and ways of expressing their sexuality, all people should experience their bodies and sexuality in a positive and fulfilling manner.

- Every person has the right to access information services relating to sexual rights and health irrespective of any other considerations.

-Recognize that gender is a fluid concept and gender roles are based on narrow societal constructs. Every individual has the right to choose and ascribe to different gender and/or sexual identities.

- Respect, and not violate, other people’s bodies and personal spaces, laying emphasis on the importance of consent in relationships.

- Recognize that different people have different body types and address existing stereotypes relating to body types, sexuality & notions of what is attractive.

- Respect their bodies and take proper care of their bodies with respect to nutrition, exercise, sexual health and get regular health checkups.

- Recognize the importance of accessing correct information from reliable sources, leading to informed decision making.

Along with any sort of work comes a tag, a tendency to define and interpret where certain actions, event or piece of work fits in. For The YP, this process was not a conscious process, but we found a space, where we feel our work very naturally fit.

Language here again became important. What are our politics and our stands?  What language and with what words do we speak?  Who do we speak on behalf of? Do we identify ourselves with any movement?  Specifically in relation to our work with sexuality, how do we ensure that our work and also language is culturally appropriate-or is that even necessary?

Another question was of our engagement with social issues, with registration came the tag of NGO- a ‘not for profit registered foundation’. Words such as social change, social justice, Advocates, Activists entered our vocabulary and concept notes.

The term youth activism has been used to describe our work in multiple arenas, both internally and externally. But what does that mean, specifically in the context of work around sexuality and gender, how is activism interpreted when placed in the milieu of urban issues and people? These are some of the questions that this series of article hopes to explore.

Ishita Sharma

उत्तर प्रदेश में युवाओं को प्रजनन एवं यौनिक स्वास्थ्य एवं अधिकार की जानकारी इस लिए आवश्यक है क्योंकि –

पिछली पीढी की तुलना में किशोरियों में समय से पहले शारीरिक परिवर्तन की शुरुआत हो जाती है।

माहवारी के समय आपने शरीर के बारे में जानकारी न होने से काफी नकारात्मक परिणाम उनके प्रतनन स्वास्थ्य के संदर्भ में देखे जा सकते हैं।य

  • एक अध्ययन के अनुसार बडी संख्या में लडकियों को अपनी माहवारी के बारे में पता ही नहीं था जब उन्हें माहावारी शुरु हुई। जिन्हें जानकारी थी उसमें से अधिकतर को इसके कारण उनके व्यवहार व इधर-उधर जाने पर लगी पांबन्दियों की जानकारी थी। तीन चौथाई लडकियों ने बताया कि वे माहवारी के समय पुराने गन्दे कपडे इस्तेमाल करते हैं। और उसमें से अधिकतर ने उन्हीं इस्तमाल किये कपडों को बार-बार इस्तमाल करने के बारे में बताया।
  • आई.टी.आई रिर्पोडक्टिव टैक्ट इंफैक्शन की निरंतरका उन लडकियों में तीन गुना ज्यादा पाई गयी जो कि माहवारी के दौरान गन्दे कपडे इस्तेमाल करती हैं या सफाई नहीँ रख पाती हैं।
  • प्रजनन अस्वस्था के पीछे माहवारी के समय की जाने वाली लापरवाही एक बडा कारण निकलकर आया।

उत्तर प्रदेश में कम उम्र में विवाह करना एक आम बात है जिसके चलते किशोरावस्था में ही एक बडी संख्या में शारीरक संबंध बना लेती हैं। जिसकी वजह से कई लडकियां 19 साल से कम उम्र में ही गर्भधारण कर लेती है। गर्भावस्था के दौरान जटिलतायें जैसे अनिमिया, स्वतः गर्भपात, तथा इक्लेम्पिया आदि किशोर लडकियों में ज्यादा पाया गया है जो कि गर्भधारण के समय मौत के कारण बनते हैं।

  • उत्तर प्रदेश की 20-24 उम्र की 53 प्रतिषत महिलाओं की शादी 18 साल ले कम हो जाती है।
  • उत्तर प्रदेश में 25-49 वर्ष की महिलाओ के पहले बच्चे के जन्म के समय आयु 19.4 है। जबकि 15-19 साल की 14.3 प्रतिषत महिलायें या तों मां बन जाती है।
  • 5 में से एक विवाहित युवती 17 वर्ष की उम्र में मां बन जाती है।
  • किशोरावस्था में लडकियां शारीरिक रुप से पूर्ण विकसित नहीं होती, अतः उस उम्र में गर्भधारण या बच्चे का जन्म उन्हें जटिल शारीरिक स्थिति में पहुंचा देता हैं।
  • भारत में 1000 बच्चों के जन्म में से लगभग 107 जन्म 15 से 19 वर्ष की महिलाओं में होते है।
  • नवजात शिशु मृत्यु दर जिसके लिए असुरक्षित प्रसव एक मुख्य कारण है, उत्तर प्रदेश में प्रमुख रुप से अधिक है, खासकार किशोरावस्थाकी माताओं में जिनकी उम्र 20 से 29 साल है। 15 से 19 वर्ष की उम्र पर प्रसव में प्रत्येक 1,000 जन्म पर शिशु मृत्यु दर 85.4 है जबकि 20 से 29 साल में यह 52 है।
  • 1995 में किशोरावस्था में मातृत्व मृत्यु दर प्रति एक लाख जीवित जन्म पर 645 था जबकि बडे लोगों जिनकी उम्र 20-34 साल थी, में प्रति एक लाख जीवित जन्म पर 342 था।

अनु ,’ परिवर्तन में युवा ’ , सहयोग – उत्तर प्रदेश

1 Comment

  1. Superb blog post, I have book marked this internet site so ideally I’ll see much more on this subject in the foreseeable future!

Got something to say? Go on! कुछ कहना चाहते हैं ? यहाँ लिखें ।