<!--:en-->15 things about my sexuality – Part II<!--:--><!--:hi-->किशोरावस्था के दौरान होने वाले शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक तथा सामाजिक परिवर्तन<!--:-->
Feb 2011 28

’15 things about my sexuality’

1) I don’t know what sexuality means. For me its my sexual state of mind. Or of body.

2) I am gay. Lesbian. Bisexual. Trans sexual. Pan sexual and straight. My sexuality changes everyday, hate the above mentioned words, I don’t like labels. I am all of the above and none of the above also. If you can like a different color everyday then why not sexual preference ?

3) I would love to call myself a sexual person even though I haven’t had sex ever. Sexuality and sex are different.

4) I became sexually active when I was 12 , with my first boyfriend. That was my first kiss, I don’t remember how it happened and why it happened.

5) I was molested when I was 15 by my science tutor. I was so upset that I could never tell my parents about it for a month and when I did it was worse. I did not let anyone touch me for 1 year after that.

6) I was in a 5 year long violent relationship with a man I loved – I never had the balls to get out of it, or stand up for myself. I never understood that verbal and physical abuse could mean violence. Now, I wish I go back in time and believe in myself more.

7) Boobs are the best part of my body, its also something people call me.

8) My entire school life till the 11th grade I was called a ‘whore’- because I would speak to guys and date them.

9) I believe in one night stands and I believe in relationships. I have had both, they remain special.

10) I watch porn, I like it. I am very open out it. The sophisticated people call it ‘yuck’. They don’t understand how porn can give you pleasure. Guess what? They don’t NEED to.

11) I believe in sex work. I prostitute my brain in my work place, there is nothing wrong in doing the same with you body.

12) If I get lots of money I will sleep with someone if they are hot and rich- no this isn’t for only money. You need feel pleasure in the work you do. And I like sex, a lot.

13) People try really hard not to judge me, to understand me and then they misinterpret me. Yes, the open minded people too. The open who claim to accept different sexuality and the same ones who talk about it.

14) In my past relationships, both with men and women I have been forced to have sex. But after the incidents mentioned above taught me how to say no.

15) You don’t define how I think, how I look, how I feel. I can think like a girl, look like a boy and feel think about both. I define my sexuality- I make it, change it, feel it, believe it and accept it.

Anonymous, 20, Delhi

िशोरावस्था वह समय है, जब मानव अपना बचपन छोड़कर जवानी की दहलीज पर कदम रखता है। इस समय बालक और बालिका से युवक और युवती बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। यह 10 से 19 वर्ष की अवस्था है। इस दौरान बहुत सारे परिवर्तन होते है। ये परिवर्तन मस्तिष्क में स्थित पिटयुटरी ग्लेंड के स्त्राव के कारण होता है जो हारमोन्स की क्रियाशीलता के फलस्वरूप है। इन्हीं हार्मोन्स के कारण किशोरावस्था के शारीरिक भावनात्मक व सामाजिक परिवर्तन होते है।

सामान्य तौर पर लड़कियों में 10 से 15 वर्ष की आयु और लड़कोंं में 12 से 16 वर्ष में परिवर्तन प्रारंभ हो जाते है लड़कों में टेस्टीज या वृष्णाग्रंथि से पुरूष हार्मोन्स टेस्टॉस्टरोन और लड़कियों मsa Ovary से एस्ट्रोजन और प्रोजोसट्रोन उत्पन्न होते है।

लड़कियों में शारीरिक परिवर्तन :-

  • अचानक शरीर में विकास :- ऊंचाई और वजन में वृद्धि होती है। कुल्हे बड़े होते हे और कमर पतली होती जाती है। शरीर में स्त्री-सुलभ सुडौलता आ जाती है।
  • प्रजनन अंगों का विकास :- योनि/गर्भाशय में वृद्धि होती है।
  • योनि मार्ग से सफेद चिपचिपे द्रव का स्राव होता है। यह स्वाभाविक है।
  • डिम्बकोस क्रियाशील हो जाता है।
  • मासिक धर्म की शुरूआत ।

द्वितीय लैंगिक गुण :-

  • बगल और जनजांगों के आस-पास बाल उगते है।
  • स्तन बडे और विकसत हो जाते है। उनके आकार से दुग्ध निर्माण प्रणाली का कोई संबंध नहीं होता। कभी-कीाी एक स्तन दूसरे से अधिक बड़ा होता है।
  • आवाज पतली होने लगती है।
  • चेहरे पर मुॅंहासे आने लगते है।

लडकों में शारीरिक परिवर्तन :-

  • शरीर की लंबाइ और वजन में वृद्धि होती है। कंधे चौड़े होते है और स्वायु बढ़ने लगते है।
  • प्रजनन अंगों का विकास।
  • लिंग/शिश्न और अण्डकोष का आकार बढ़ने लगता है। उनमें से एक वृषण सामान्य दूसरे से नीचा होता है जो कि एक सामान्य स्थित है।
  • अण्डकोष में शुक्राणुओं का निर्माण होने लगात है।

द्वितीय लैंगिक गुण :-

  • हाथों, पैरों, बगल में, सीने, चेहरे तथा जननांगों के आसपास वाल आ जाते है।
  • दाढ़ी-मूँछ निकलने लगती है।
  • मुँहासे आते है।
  • आवाज भारी हो जाती है।

किशोरावस्था में मानसिक व भावनात्मक परिवर्तन :-

  • कल्पना में लीन होने जाना तथा स्वप्न देखना।
  • विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण।
  • यौन उत्तेजना की शुरूवात/काम भावनाओं का जागृत होना।
  • चिडचिड़सवप, चंचलता एवं गुस्सा बढ़ जाना।
  • तनाव, झिझक एवं संकोच महसूस करना।
  • उतावलापन और जोखिम उठाने की प्रवृत्ति विकसित होना
  • दोस्तों से प्रभावित होना।
  • इच्छाओं, नैतिकता, मूल्यों में असमंजस्य पैदा होना।
  • माता-पिता एवं अन्य बड़ों से संबंधों में बदलाव।
  • स्वतंत्रता और जिम्मेदारियों में बदलाव।

किशोरावस्था में सामाजिक परिवर्तन :-

  • पारिवारिक संबंधों में घनिष्ठता कम होने लगती है । माता-पिता और किशोर-किशोरियों के बीच दूरी बढ़ जाती है।
  • सभी की रोक-टोक बुरी लगती है।
  • माता-पिता की अपेक्षा दोस्तों या विपरीत लिंग के दोस्तों को अधिक महत्व दिया जाता है।
  • अपनी पसंद और निर्णयोें में अडिग रहना और अपना लक्ष्य निर्धारित करना।
  • पसंदीदा व्यक्ति और दोस्तों के विचार व जीवन शैली से प्रभावित होना।
  • वयस्कों के सामने अपने को आत्मनिर्भर दर्शाने की कोशिश करना।
  • जीवन मूल्यों व आदर्शो के विषय में भ्रमित होना।

किशोरावस्था के दौरान अभिभावकों को अपने बच्चों से दोस्ताना व्यवहार करना चाहिये। उनसे कुछ बिना छिपायें सारी बातों को जो किशोरावस्था के परिवर्तन से संंबंधित है चर्चा करना चाहिये। यह शरीर के विकास की एक स्वभाविक प्रक्रिया है, उन्हें बताना चाहियें। उन्हें अकेले में नहीं रहने देना चाहिये।

इसके अतिरिक्त शरीर की साफ-सफाई और उनके देखभाल की जानकारी देनी चाहिये। शरीर और बेहतर स्वस्थ्य कैसे रहे इसके लिये संतुलित आहार, खेल-कूद व व्यायाम के विषय में ध्यान देना चाहिये।

किशोरावस्था में अपने साथियों का दबाव होता है जिसके चलते उनके समूह में रहने के लिये अपने दोस्तों की आदतों का अनुकरण करना होता है, अत: दोस्तों की बुरी आदतें किशोर-किशोरियों को जोखिम भरे जीवन में ला सकती है अत: साथियों के दबाव से बचना होगा और अपने विवेक व समझदारी का उपयोग करन करना होगा।

अपने साथियों के दबाव में न आना ना कहना सीखे :-

  • अपनी इच्छा एवं आदर्श का सम्मान करें।
  • अपने निर्णय स्वयं ले।
  • अपनी भावनाओं को समझे और उस पर आस्था रखे।
  • दूसरों द्वारा आप पर हावी होने के प्रयास को पहचाने और उससे बचें।
  • अपनी अनिच्छा को शब्दों के अतिरिक्त भी प्रदर्शित करना सीखें।
  • आत्मविश्वास रखे और जब ’’न’’ कहना हो तो ’’न’’ कहने का आनंद लें।

’’ना’’ कहने के तरीके :-

  • नम्रतापूर्वक मना करना।
  • कारण बताकर इंकार करना।
  • अपने इंकार को दुहराना।
  • अपने स्थान से हट जाना।
  • अनसुना करना।
  • ऐसी परिस्थिति में ही न पड़ना जहां अनुचित दबाव हो।
  • ऐसे साथी को ढूंढना जो आपका समर्थन करें।
  • अपनी भावनाओं के बारे में चर्चा करना।
  • साथियों के दबाव के कारण :-
  • समूह में शामिल होने के लिये ।
  • ध्यान आकर्षित करने के लियs
  • प्रसिद्वि या चर्चित होने के लिये
  • दोस्त बनाने के लिये
  • तुरन्त आनंद प्राप्त करने के लिये
  • घर में तथा विद्यालय में उचित स्नेह व प्रशंसा न मिलने पर, इस आवश्यकता की पूर्ति दोस्तों द्वारा करने के लिये।
  • अपने विद्रोही विचारों हेतु श्रोता प्राप्त करने के लिये।
  • अपने विद्रोही विचारों हेतु श्रोता प्राप्त करने के लिये।

साथियों के दबाव में आने के कारण को पहचान कर उसका निषेध करना उचित होता है।

Lessons Learnt
Nov 2011 26

I cry, I dance. I laugh, I talk.
I love, I lie. I am a young person.
I understand, I care.
I realize, I reflect, I respond.
Because if I don’t, who will?

Aam Sabha, September 2011 

I have always thought about the need to know everything and be aware. However, awareness, in the definitive sense, has a broad purview, and this thought has always been accompanied by a probing question – if change needs to be made, is awareness solely enough? And so I carried many more questions like this, along with me to the very first ‘Aam Sabha’ of The YP Foundation.

When I entered I saw three corners set up in the hall on three different topics and young people like me walking around and trying to decide, as if going through the menu in a restaurant, looking around what food for thought they want to take back home – whether from the “Alternative Sexual Identities” by Maria Mehra, from “Safe Spaces” by Prabhleen Tuteja from ‘Safe Delhi Campaign- of the NGO Jagori” or from “Sexual and Reproductive Rights” by Anusha Hariharan from the queer collective ‘Nigah’.

The ‘Aam Sabha’ started with an ice-breaker where we had to gather into different groups in order to yell words that made us uncomfortable, out loud. Never in my life had I yelled the words penis, vagina and clitoris so loud. All this had already built up a curiosity in me, I knew I wanted to be a part of all the three sessions and so I decided to divide my time to all three topics accordingly.

Maria Mehra, a dynamic transgender woman, asked us in the session to close our eyes and listen to her voice. She told us that she had always had a feminine voice, that when she was a boy, her voice never cracked to acquire the baritone that we usually identify with masculinity. Our eyes still closed, she asked us to raise our hands if we still thought her to be a man or deserved to be identified as one.

A moment later, we opened our eyes, and looked around. Not one person had raised their hand, and it was in this silent agreement that our session with Maria began. In a society where gender roles are set in stone and anyone who fails to come under the “male” or “female” tag is just thought of as abnormal. The session went ahead with all of us getting acquainted with trials that people like her face in the world, from the difficulty to use public bathrooms as neither gender accepts them as their own, to the confusion while writing their gender in a government form. We listened with rapt attention as she told us about how she was blatantly rejected at a job recruitment agency because she was, well, ‘different’.

On the adjacent corner, the session on Safe Spaces by Prabhleen Tuteja addressed issues that I could relate to on a very close basis, and experiences that I encounter every day. Many a times while travelling alone in the city, when it gets a little dark, certain dimly lit and the not-so-busy areas tend to make me nervous, even if I’m familiar with the place; and the tag of “Unsafe City for Women” on Delhi/NCR doesn’t help! In the discussion, our group was further divided into three sub-groups and each sub-group was given a certain ‘identity’, like- a girl in her early 20’s from the North-East or a 20 year old boy carrying a lot of cash, and so on. We were to come to a consensus on how safe or unsafe a particular area in a typical Delhi neighbourhood (areas like a Temple, an ATM, a park, a college etc.) was for these different identities. It made us realise how certain problems affect different kinds of people differently, how one needed to look at things from the point of view of different people around us.

The last session was on “Sexual and Reproductive Rights” by Anusha Hariharan from Nigah Foundation.  Anusha began the session by asking a question on what one means by a “relationship”. My first thought was that relationships could hold different meanings to different people. It can mean love to some or sex to others, or may pertain to friendship. As the discussion moved further I realised how the society moulds us to believe in a very narrow way, how the definition of a romantic relationship gets limited only to the one which exists between people of the opposite sex and dismisses any romantic relationship between two men or two women. It is affirmatively classified as unnatural.
Now I come back to my original question – is “Awareness” solely enough? We are an aware generation but still somewhere there is a sense of indifference in all of us, we know about people like Maria, who knows 7 different languages, and has a lot of  potential, but is not able to enjoy the opportunities that we are bestowed with because well, she is “different”. Again, we don’t really want to take the pain of raising our voice in their support.
In my own city, which I am constantly reminded of by all ‘keep your city neat and clean’ banners, after a certain time I do not feel safe because I belong to the gender which society has shaped into a vulnerable one.I am aware of the issues and problems around me, most of us are, but the point here lies in the fact that knowing isn’t enough, getting up and doing something about it is what we need. Taking action requires a space to talk, which allows one to project her/his thoughts. We don’t only need ‘safe spaces’ for our bodies but also for our thoughts.
  – Aditi Annapurna, 18 years
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Reclaiming Our Choices is a loosely affiliated group of concerned individuals and organizations that seek to address issues of gender, sexuality, health and rights by initiating, facilitating, participating and supporting an action-oriented campaign in Delhi. It is supported by UNESCO, in collaboration with Equal India, Must Bol, NAZ (India) Foundation, Queer Campus, and The YP Foundation. With the understanding that empowerment carries different meanings in diverse situations we do not aim to guide any movement. Rather, we seek to facilitate one part of a larger conversation. We hope that through a de-centralized campaign flowing from the hearts and minds of youth across the city, challenging, exciting, and unexpected results will follow.

Aam Sabha’  held on 12 September 2011 was an initiative by ‘Reclaiming Our Choices’. The event was a discussion modelled on the concept of a ‘town hall’ on themes of sexuality and rights, alternative sexual identities and orientations, public safety and violence and involving young people in these discussions.

The Way Forward-

The campaign would move forward by forming and organizing events on lines similar to this “Aam Sabha” and by using interactive mediums like movie screenings across the city with the support of the partner organisations, professionals and participants in the following months.

मैंने हमेशा सब कुछ जान ने और हर सांसारिक गतिविधि से अवगत रहने को एहमियत दी है . पर जागरूकता की परिभाषा कुछ दायरों में सीमित न रह कर अनेक रूप ले लेती है और यही विचार मुझे सोचने पर मजबूर करता है के अगर परिवर्तन होना चाहिए तो क्या सिर्फ जागरूकता ही काफी है ? और ऐसे ही तमाम सवाल अपने दिल में लिए मैं वाई. पी. फौन्देशन की पहली ‘आम सभा ‘ में गयी .

जैसे ही मैंने प्रवेश किया , मैंने तीन अलग कोनो में अपने जैसे युवाओ को एक समूह में बैठा पाया जहाँ वे तीन अलग विषयो पर विचार विमर्श कर रहे थे और कई लोग यह निर्णय ले पाने में असक्षम थे कि किस समूह में बैठा जाये . एक तरफ मारिया मेहरा ‘वैकल्पिक यौनिक पहचान ‘ पर अपने विचार प्रकट कर रही थीं तो दूसरी तरफ ‘जागोरी ‘ कि प्रभ्लीन टुटेजा ने ‘सुरक्षित स्थल ‘ पर एक रोचक वार्तालाप से सबका ध्यान आकर्षित कर रखा था . ‘निगाह ‘ कि अनुषा हरिहरन ने ‘यौनिक एवं प्रजनन अधिकार ‘ के विषय पर चर्चा को दिलचस्प बनाय रखा.

‘आम सभा ‘ कि शुरुआत एक रोचक आइस – ब्रेकर से की गयी जहाँ हमे अलग अलग समूहों में खड़े हो कर उन शब्दों को जोर से बोलना था जिनको बोलने में हम अक्सर हिचकिचाते हैं . अपनी ज़िन्दगी में आज तक मैंने कभी भी लिंग , योनी या टितनी जैसे शब्द इतनी ऊंची आवाज़ में चीख कर नहीं कहे थे . इन सब के कारण मेरे अन्दर आगे होने वाले क्रियाकलापों को लेकर उत्सुकता काफी बढ़ गयी और मैंने निर्णय लिया के मैं तीनो समूहों में होने वाली चर्चा का हिस्सा बनूंगी .

मारिया मेहरा , जो की एक सक्रिय प्रगतिशील विप्रित्लिंगी महिला हैं , ने हमसे अपनी आँखें बंद करके उनकी आवाज़ को गौर से सुन ने के लिए कहा . उन्होंने हम को बताया के उनकी आवाज़ हमेशा से ही एक औरत जैसी थी और जब वे एक लड़का थीं तो उनकी आवाज़ बाकी लडको की तरह नहीं फटी तथा उनकी आवाज़ में पुरुषो जैसा मध्यम स्वर नहीं आ पाया . हमारी आँखें बंद थीं और उन्होंने हमसे अपने हाथ ऊपर करने के लिए कहा अगर हम तब भी उनको एक पुरुष मानते थे या उनको एक पुरुष होने के योग्य समझते थे . कुछ पल बाद , हम ने अपनी आँखें खोली और देखा के किसी ने भी अपना हाथ ऊपर नहीं किया था और इसी शांत सहमति में मारिया ने चर्चा सत्र प्रारंभ किया . ऐसे समाज में , जहाँ लिंगो के कार्य -भार तथा भूमिका पत्थर की लकीर माने जाते हैं और जहाँ ‘स्त्री ‘ या ‘पुरुष ‘ के लेबल में न आ पाने वाला हर व्यक्ति तिरस्कार एवं उपहास का शिकार हो जाता है , वहां इस सत्र की एहमियत काफी बढ़ जाती है . हमारे वार्तालाप से हमे मारिया जैसे व्यक्तियों के आगे आने वाली कठिनाइयों के बारे में तो पता चला ही साथ ही उनको जिन परेशानियों का सामना करना पड़ता है उसे सुनकर हम सब हैरान थे – वे लोग सार्वजनिक शौचालयों का इस्तेमाल नहीं कर सकते क्योंकि दोनों ही लिंग उनको अपनाने से इंकार करते हैं और उनको सरकारी दस्तावेजों में लिंग भरने में भी जिस कशमकश का सामना करना पढता है उसे सुनकर हम सबको हैरानी भी हुई तथा एक प्रकार से समाज की रूडिवादी विचारधारा पर क्रोध भी आया . जब मारिया ने बताया कि उनको एक नौकरी भर्ती संसथान ने सिर्फ इसलिए अस्वीकृत कर दिया क्योंकि वे ‘अलग ‘ हैं , हम सब भौचक्के रह गए .
दुसरे कोने में , प्रभ्लीन टुटेजा ने ‘सुरक्षित स्थल ‘ पर जब बातचीत शुरू की तो मुझे अपने कई अनुभव याद आ गए और काफी चीज़ें मुझे अपने से सम्बंधित लगीं . कई बार अँधेरा हो जाने पर जानी -पहचानी जगहें भी सुनसान होने के कारण डरावनी लगती हैं और मेरे अन्दर एक अजीब सा डर आ जाता है , शायद इसलिए क्योंकि दिल्ली को औरतो के लिए एक असुरक्षित शहर माना जाता है . हमारे समूह को अनेक समूहों में बांटा गया और सभी को एक किस्म की ‘पहचान ‘ दी गयी , जैसे उत्तर -पूर्वी भारत से आई 20 साल की एक लड़की , 20 साल का लड़का जो पैसे लेकर जा रहा है और ऐसी ही अनेक ‘पहचाने ‘. हम इस निष्कर्ष पर पहुचे के दिल्ली का कोई इलाका कितना सुरक्षित या असुरक्षित है , चाहे वो हमारा गली -मोहल्ला , मंदिर , एय. टी.एम्., पार्क , कॉलेज या सिनेमा हॉल ही क्यों न हो . और इन जगहों की सुरक्षा को अलग अलग पहचानो के हिसाब से भी मापा गया . हमे एहसास हुआ की अलग पहचान के व्यक्तियों को एक परिस्थिति अलग अलग रूप से प्रभावित करती

Shareer Apna, Adhikaar Apne

“Young girls in our village are raised only to become mothers.”

kybkyr-report-img
We are very happy to share with you ‘Shareer Apna, Adhikaar Apne – A Youth-Led Report on Policy Recommendations to ensure Comprehensive Sexuality Education (CSE) for Young People in Uttar Pradesh’.

The report is part of a two-year pilot programme supported by the John. D and Catherine T. MacArthur Foundation that addresses the need to strengthen CSE within Life Skills and Sexual and Reproductive Health (SRH) Information programmes for young people in Uttar Pradesh and was developed jointly by The YP Foundation (TYPF) and SAHAYOG with technical support from UNESCO India was released as part of a State Level Dialogue held on 26th August, 2013 in Jai Shanker Prasad Hall, Qaiserbagh, Lucknow.

The report shares the experiences and recommendations from a State-Level Consultation held in 2011 that engaged with 52 youth activists and leaders from 19 districts whose programmes are reaching out to 1,96,905 beneficiaries in Uttar Pradesh. It has been designed as a tool for young people to advocate with state and national-level policymakers and government officials for the inclusion and/or strengthening of Comprehensive Sexuality Education within existing policies and programmes that address adolescent and young people’s sexual and reproductive health.

The report is a reflection of the voices and aspirations of young people who have been leading SRH interventions with their peers at community level, articulating their views, opinions and recommendations on the need for CSE within the state.

“The right to compulsory health services should be available through constitution. Govt. doesn’t give any charity, as it has to give us our rights according to constitution.”

– M/22 years (Varanasi)

“It’s important to get full information on health. Otherwise you will not be able to prevent yourself from getting diseases. This is what worries me.”

– M/24 years (Barabanki)

Photos1

We hope that this report, available both in Hindi and English, can be used to advance platforms for dialogue between young people with policy makers, government officials, media, civil society and key stakeholders at community, district and state level and could be useful to the work you are doing. The report can also be downloaded from here.

“Young people need to be empowered to advocate for this information within their homes, so that parents can become strong allies. Participants in the consultation indicated the desire to have the opportunity to address religious conservatism in their own communities. There was positivity, willingness and an excitement amongst participants to be able to take these discussions forward and tackle the challenges that the same would bring.”

We hope you can find the time to go through the report and share your feedback with us, we would deeply appreciate your inputs and advice on the same.

UP-Report-Feature-ImageDownload your copy of the report now from the link below!

Download the report (English, PDF)
Download the report (Hindi, PDF)

Photos from the Report Launch

Press

Please download the press release below and click on the press clippings to read what’s been written about the report in the media.

Press release, August 26, 2013

Lessons Learnt
Nov 2011 26

I cry, I dance. I laugh, I talk.
I love, I lie. I am a young person.
I understand, I care.
I realize, I reflect, I respond.
Because if I don’t, who will?

Aam Sabha, September 2011 

I have always thought about the need to know everything and be aware. However, awareness, in the definitive sense, has a broad purview, and this thought has always been accompanied by a probing question – if change needs to be made, is awareness solely enough? And so I carried many more questions like this, along with me to the very first ‘Aam Sabha’ of The YP Foundation.

When I entered I saw three corners set up in the hall on three different topics and young people like me walking around and trying to decide, as if going through the menu in a restaurant, looking around what food for thought they want to take back home – whether from the “Alternative Sexual Identities” by Maria Mehra, from “Safe Spaces” by Prabhleen Tuteja from ‘Safe Delhi Campaign- of the NGO Jagori” or from “Sexual and Reproductive Rights” by Anusha Hariharan from the queer collective ‘Nigah’.

The ‘Aam Sabha’ started with an ice-breaker where we had to gather into different groups in order to yell words that made us uncomfortable, out loud. Never in my life had I yelled the words penis, vagina and clitoris so loud. All this had already built up a curiosity in me, I knew I wanted to be a part of all the three sessions and so I decided to divide my time to all three topics accordingly.

Maria Mehra, a dynamic transgender woman, asked us in the session to close our eyes and listen to her voice. She told us that she had always had a feminine voice, that when she was a boy, her voice never cracked to acquire the baritone that we usually identify with masculinity. Our eyes still closed, she asked us to raise our hands if we still thought her to be a man or deserved to be identified as one.

A moment later, we opened our eyes, and looked around. Not one person had raised their hand, and it was in this silent agreement that our session with Maria began. In a society where gender roles are set in stone and anyone who fails to come under the “male” or “female” tag is just thought of as abnormal. The session went ahead with all of us getting acquainted with trials that people like her face in the world, from the difficulty to use public bathrooms as neither gender accepts them as their own, to the confusion while writing their gender in a government form. We listened with rapt attention as she told us about how she was blatantly rejected at a job recruitment agency because she was, well, ‘different’.

On the adjacent corner, the session on Safe Spaces by Prabhleen Tuteja addressed issues that I could relate to on a very close basis, and experiences that I encounter every day. Many a times while travelling alone in the city, when it gets a little dark, certain dimly lit and the not-so-busy areas tend to make me nervous, even if I’m familiar with the place; and the tag of “Unsafe City for Women” on Delhi/NCR doesn’t help! In the discussion, our group was further divided into three sub-groups and each sub-group was given a certain ‘identity’, like- a girl in her early 20’s from the North-East or a 20 year old boy carrying a lot of cash, and so on. We were to come to a consensus on how safe or unsafe a particular area in a typical Delhi neighbourhood (areas like a Temple, an ATM, a park, a college etc.) was for these different identities. It made us realise how certain problems affect different kinds of people differently, how one needed to look at things from the point of view of different people around us.

The last session was on “Sexual and Reproductive Rights” by Anusha Hariharan from Nigah Foundation.  Anusha began the session by asking a question on what one means by a “relationship”. My first thought was that relationships could hold different meanings to different people. It can mean love to some or sex to others, or may pertain to friendship. As the discussion moved further I realised how the society moulds us to believe in a very narrow way, how the definition of a romantic relationship gets limited only to the one which exists between people of the opposite sex and dismisses any romantic relationship between two men or two women. It is affirmatively classified as unnatural.
Now I come back to my original question – is “Awareness” solely enough? We are an aware generation but still somewhere there is a sense of indifference in all of us, we know about people like Maria, who knows 7 different languages, and has a lot of  potential, but is not able to enjoy the opportunities that we are bestowed with because well, she is “different”. Again, we don’t really want to take the pain of raising our voice in their support.
In my own city, which I am constantly reminded of by all ‘keep your city neat and clean’ banners, after a certain time I do not feel safe because I belong to the gender which society has shaped into a vulnerable one.I am aware of the issues and problems around me, most of us are, but the point here lies in the fact that knowing isn’t enough, getting up and doing something about it is what we need. Taking action requires a space to talk, which allows one to project her/his thoughts. We don’t only need ‘safe spaces’ for our bodies but also for our thoughts.
  – Aditi Annapurna, 18 years
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Reclaiming Our Choices is a loosely affiliated group of concerned individuals and organizations that seek to address issues of gender, sexuality, health and rights by initiating, facilitating, participating and supporting an action-oriented campaign in Delhi. It is supported by UNESCO, in collaboration with Equal India, Must Bol, NAZ (India) Foundation, Queer Campus, and The YP Foundation. With the understanding that empowerment carries different meanings in diverse situations we do not aim to guide any movement. Rather, we seek to facilitate one part of a larger conversation. We hope that through a de-centralized campaign flowing from the hearts and minds of youth across the city, challenging, exciting, and unexpected results will follow.

Aam Sabha’  held on 12 September 2011 was an initiative by ‘Reclaiming Our Choices’. The event was a discussion modelled on the concept of a ‘town hall’ on themes of sexuality and rights, alternative sexual identities and orientations, public safety and violence and involving young people in these discussions.

The Way Forward-

The campaign would move forward by forming and organizing events on lines similar to this “Aam Sabha” and by using interactive mediums like movie screenings across the city with the support of the partner organisations, professionals and participants in the following months.

मैंने हमेशा सब कुछ जान ने और हर सांसारिक गतिविधि से अवगत रहने को एहमियत दी है . पर जागरूकता की परिभाषा कुछ दायरों में सीमित न रह कर अनेक रूप ले लेती है और यही विचार मुझे सोचने पर मजबूर करता है के अगर परिवर्तन होना चाहिए तो क्या सिर्फ जागरूकता ही काफी है ? और ऐसे ही तमाम सवाल अपने दिल में लिए मैं वाई. पी. फौन्देशन की पहली ‘आम सभा ‘ में गयी .

जैसे ही मैंने प्रवेश किया , मैंने तीन अलग कोनो में अपने जैसे युवाओ को एक समूह में बैठा पाया जहाँ वे तीन अलग विषयो पर विचार विमर्श कर रहे थे और कई लोग यह निर्णय ले पाने में असक्षम थे कि किस समूह में बैठा जाये . एक तरफ मारिया मेहरा ‘वैकल्पिक यौनिक पहचान ‘ पर अपने विचार प्रकट कर रही थीं तो दूसरी तरफ ‘जागोरी ‘ कि प्रभ्लीन टुटेजा ने ‘सुरक्षित स्थल ‘ पर एक रोचक वार्तालाप से सबका ध्यान आकर्षित कर रखा था . ‘निगाह ‘ कि अनुषा हरिहरन ने ‘यौनिक एवं प्रजनन अधिकार ‘ के विषय पर चर्चा को दिलचस्प बनाय रखा.

‘आम सभा ‘ कि शुरुआत एक रोचक आइस – ब्रेकर से की गयी जहाँ हमे अलग अलग समूहों में खड़े हो कर उन शब्दों को जोर से बोलना था जिनको बोलने में हम अक्सर हिचकिचाते हैं . अपनी ज़िन्दगी में आज तक मैंने कभी भी लिंग , योनी या टितनी जैसे शब्द इतनी ऊंची आवाज़ में चीख कर नहीं कहे थे . इन सब के कारण मेरे अन्दर आगे होने वाले क्रियाकलापों को लेकर उत्सुकता काफी बढ़ गयी और मैंने निर्णय लिया के मैं तीनो समूहों में होने वाली चर्चा का हिस्सा बनूंगी .

मारिया मेहरा , जो की एक सक्रिय प्रगतिशील विप्रित्लिंगी महिला हैं , ने हमसे अपनी आँखें बंद करके उनकी आवाज़ को गौर से सुन ने के लिए कहा . उन्होंने हम को बताया के उनकी आवाज़ हमेशा से ही एक औरत जैसी थी और जब वे एक लड़का थीं तो उनकी आवाज़ बाकी लडको की तरह नहीं फटी तथा उनकी आवाज़ में पुरुषो जैसा मध्यम स्वर नहीं आ पाया . हमारी आँखें बंद थीं और उन्होंने हमसे अपने हाथ ऊपर करने के लिए कहा अगर हम तब भी उनको एक पुरुष मानते थे या उनको एक पुरुष होने के योग्य समझते थे . कुछ पल बाद , हम ने अपनी आँखें खोली और देखा के किसी ने भी अपना हाथ ऊपर नहीं किया था और इसी शांत सहमति में मारिया ने चर्चा सत्र प्रारंभ किया . ऐसे समाज में , जहाँ लिंगो के कार्य -भार तथा भूमिका पत्थर की लकीर माने जाते हैं और जहाँ ‘स्त्री ‘ या ‘पुरुष ‘ के लेबल में न आ पाने वाला हर व्यक्ति तिरस्कार एवं उपहास का शिकार हो जाता है , वहां इस सत्र की एहमियत काफी बढ़ जाती है . हमारे वार्तालाप से हमे मारिया जैसे व्यक्तियों के आगे आने वाली कठिनाइयों के बारे में तो पता चला ही साथ ही उनको जिन परेशानियों का सामना करना पड़ता है उसे सुनकर हम सब हैरान थे – वे लोग सार्वजनिक शौचालयों का इस्तेमाल नहीं कर सकते क्योंकि दोनों ही लिंग उनको अपनाने से इंकार करते हैं और उनको सरकारी दस्तावेजों में लिंग भरने में भी जिस कशमकश का सामना करना पढता है उसे सुनकर हम सबको हैरानी भी हुई तथा एक प्रकार से समाज की रूडिवादी विचारधारा पर क्रोध भी आया . जब मारिया ने बताया कि उनको एक नौकरी भर्ती संसथान ने सिर्फ इसलिए अस्वीकृत कर दिया क्योंकि वे ‘अलग ‘ हैं , हम सब भौचक्के रह गए .
दुसरे कोने में , प्रभ्लीन टुटेजा ने ‘सुरक्षित स्थल ‘ पर जब बातचीत शुरू की तो मुझे अपने कई अनुभव याद आ गए और काफी चीज़ें मुझे अपने से सम्बंधित लगीं . कई बार अँधेरा हो जाने पर जानी -पहचानी जगहें भी सुनसान होने के कारण डरावनी लगती हैं और मेरे अन्दर एक अजीब सा डर आ जाता है , शायद इसलिए क्योंकि दिल्ली को औरतो के लिए एक असुरक्षित शहर माना जाता है . हमारे समूह को अनेक समूहों में बांटा गया और सभी को एक किस्म की ‘पहचान ‘ दी गयी , जैसे उत्तर -पूर्वी भारत से आई 20 साल की एक लड़की , 20 साल का लड़का जो पैसे लेकर जा रहा है और ऐसी ही अनेक ‘पहचाने ‘. हम इस निष्कर्ष पर पहुचे के दिल्ली का कोई इलाका कितना सुरक्षित या असुरक्षित है , चाहे वो हमारा गली -मोहल्ला , मंदिर , एय. टी.एम्., पार्क , कॉलेज या सिनेमा हॉल ही क्यों न हो . और इन जगहों की सुरक्षा को अलग अलग पहचानो के हिसाब से भी मापा गया . हमे एहसास हुआ की अलग पहचान के व्यक्तियों को एक परिस्थिति अलग अलग रूप से प्रभावित करती

<!--:en-->15 things about my sexuality – Part II<!--:--><!--:hi-->किशोरावस्था के दौरान होने वाले शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक तथा सामाजिक परिवर्तन<!--:-->
Feb 2011 28

’15 things about my sexuality’

1) I don’t know what sexuality means. For me its my sexual state of mind. Or of body.

2) I am gay. Lesbian. Bisexual. Trans sexual. Pan sexual and straight. My sexuality changes everyday, hate the above mentioned words, I don’t like labels. I am all of the above and none of the above also. If you can like a different color everyday then why not sexual preference ?

3) I would love to call myself a sexual person even though I haven’t had sex ever. Sexuality and sex are different.

4) I became sexually active when I was 12 , with my first boyfriend. That was my first kiss, I don’t remember how it happened and why it happened.

5) I was molested when I was 15 by my science tutor. I was so upset that I could never tell my parents about it for a month and when I did it was worse. I did not let anyone touch me for 1 year after that.

6) I was in a 5 year long violent relationship with a man I loved – I never had the balls to get out of it, or stand up for myself. I never understood that verbal and physical abuse could mean violence. Now, I wish I go back in time and believe in myself more.

7) Boobs are the best part of my body, its also something people call me.

8) My entire school life till the 11th grade I was called a ‘whore’- because I would speak to guys and date them.

9) I believe in one night stands and I believe in relationships. I have had both, they remain special.

10) I watch porn, I like it. I am very open out it. The sophisticated people call it ‘yuck’. They don’t understand how porn can give you pleasure. Guess what? They don’t NEED to.

11) I believe in sex work. I prostitute my brain in my work place, there is nothing wrong in doing the same with you body.

12) If I get lots of money I will sleep with someone if they are hot and rich- no this isn’t for only money. You need feel pleasure in the work you do. And I like sex, a lot.

13) People try really hard not to judge me, to understand me and then they misinterpret me. Yes, the open minded people too. The open who claim to accept different sexuality and the same ones who talk about it.

14) In my past relationships, both with men and women I have been forced to have sex. But after the incidents mentioned above taught me how to say no.

15) You don’t define how I think, how I look, how I feel. I can think like a girl, look like a boy and feel think about both. I define my sexuality- I make it, change it, feel it, believe it and accept it.

Anonymous, 20, Delhi

िशोरावस्था वह समय है, जब मानव अपना बचपन छोड़कर जवानी की दहलीज पर कदम रखता है। इस समय बालक और बालिका से युवक और युवती बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। यह 10 से 19 वर्ष की अवस्था है। इस दौरान बहुत सारे परिवर्तन होते है। ये परिवर्तन मस्तिष्क में स्थित पिटयुटरी ग्लेंड के स्त्राव के कारण होता है जो हारमोन्स की क्रियाशीलता के फलस्वरूप है। इन्हीं हार्मोन्स के कारण किशोरावस्था के शारीरिक भावनात्मक व सामाजिक परिवर्तन होते है।

सामान्य तौर पर लड़कियों में 10 से 15 वर्ष की आयु और लड़कोंं में 12 से 16 वर्ष में परिवर्तन प्रारंभ हो जाते है लड़कों में टेस्टीज या वृष्णाग्रंथि से पुरूष हार्मोन्स टेस्टॉस्टरोन और लड़कियों मsa Ovary से एस्ट्रोजन और प्रोजोसट्रोन उत्पन्न होते है।

लड़कियों में शारीरिक परिवर्तन :-

  • अचानक शरीर में विकास :- ऊंचाई और वजन में वृद्धि होती है। कुल्हे बड़े होते हे और कमर पतली होती जाती है। शरीर में स्त्री-सुलभ सुडौलता आ जाती है।
  • प्रजनन अंगों का विकास :- योनि/गर्भाशय में वृद्धि होती है।
  • योनि मार्ग से सफेद चिपचिपे द्रव का स्राव होता है। यह स्वाभाविक है।
  • डिम्बकोस क्रियाशील हो जाता है।
  • मासिक धर्म की शुरूआत ।

द्वितीय लैंगिक गुण :-

  • बगल और जनजांगों के आस-पास बाल उगते है।
  • स्तन बडे और विकसत हो जाते है। उनके आकार से दुग्ध निर्माण प्रणाली का कोई संबंध नहीं होता। कभी-कीाी एक स्तन दूसरे से अधिक बड़ा होता है।
  • आवाज पतली होने लगती है।
  • चेहरे पर मुॅंहासे आने लगते है।

लडकों में शारीरिक परिवर्तन :-

  • शरीर की लंबाइ और वजन में वृद्धि होती है। कंधे चौड़े होते है और स्वायु बढ़ने लगते है।
  • प्रजनन अंगों का विकास।
  • लिंग/शिश्न और अण्डकोष का आकार बढ़ने लगता है। उनमें से एक वृषण सामान्य दूसरे से नीचा होता है जो कि एक सामान्य स्थित है।
  • अण्डकोष में शुक्राणुओं का निर्माण होने लगात है।

द्वितीय लैंगिक गुण :-

  • हाथों, पैरों, बगल में, सीने, चेहरे तथा जननांगों के आसपास वाल आ जाते है।
  • दाढ़ी-मूँछ निकलने लगती है।
  • मुँहासे आते है।
  • आवाज भारी हो जाती है।

किशोरावस्था में मानसिक व भावनात्मक परिवर्तन :-

  • कल्पना में लीन होने जाना तथा स्वप्न देखना।
  • विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण।
  • यौन उत्तेजना की शुरूवात/काम भावनाओं का जागृत होना।
  • चिडचिड़सवप, चंचलता एवं गुस्सा बढ़ जाना।
  • तनाव, झिझक एवं संकोच महसूस करना।
  • उतावलापन और जोखिम उठाने की प्रवृत्ति विकसित होना
  • दोस्तों से प्रभावित होना।
  • इच्छाओं, नैतिकता, मूल्यों में असमंजस्य पैदा होना।
  • माता-पिता एवं अन्य बड़ों से संबंधों में बदलाव।
  • स्वतंत्रता और जिम्मेदारियों में बदलाव।

किशोरावस्था में सामाजिक परिवर्तन :-

  • पारिवारिक संबंधों में घनिष्ठता कम होने लगती है । माता-पिता और किशोर-किशोरियों के बीच दूरी बढ़ जाती है।
  • सभी की रोक-टोक बुरी लगती है।
  • माता-पिता की अपेक्षा दोस्तों या विपरीत लिंग के दोस्तों को अधिक महत्व दिया जाता है।
  • अपनी पसंद और निर्णयोें में अडिग रहना और अपना लक्ष्य निर्धारित करना।
  • पसंदीदा व्यक्ति और दोस्तों के विचार व जीवन शैली से प्रभावित होना।
  • वयस्कों के सामने अपने को आत्मनिर्भर दर्शाने की कोशिश करना।
  • जीवन मूल्यों व आदर्शो के विषय में भ्रमित होना।

किशोरावस्था के दौरान अभिभावकों को अपने बच्चों से दोस्ताना व्यवहार करना चाहिये। उनसे कुछ बिना छिपायें सारी बातों को जो किशोरावस्था के परिवर्तन से संंबंधित है चर्चा करना चाहिये। यह शरीर के विकास की एक स्वभाविक प्रक्रिया है, उन्हें बताना चाहियें। उन्हें अकेले में नहीं रहने देना चाहिये।

इसके अतिरिक्त शरीर की साफ-सफाई और उनके देखभाल की जानकारी देनी चाहिये। शरीर और बेहतर स्वस्थ्य कैसे रहे इसके लिये संतुलित आहार, खेल-कूद व व्यायाम के विषय में ध्यान देना चाहिये।

किशोरावस्था में अपने साथियों का दबाव होता है जिसके चलते उनके समूह में रहने के लिये अपने दोस्तों की आदतों का अनुकरण करना होता है, अत: दोस्तों की बुरी आदतें किशोर-किशोरियों को जोखिम भरे जीवन में ला सकती है अत: साथियों के दबाव से बचना होगा और अपने विवेक व समझदारी का उपयोग करन करना होगा।

अपने साथियों के दबाव में न आना ना कहना सीखे :-

  • अपनी इच्छा एवं आदर्श का सम्मान करें।
  • अपने निर्णय स्वयं ले।
  • अपनी भावनाओं को समझे और उस पर आस्था रखे।
  • दूसरों द्वारा आप पर हावी होने के प्रयास को पहचाने और उससे बचें।
  • अपनी अनिच्छा को शब्दों के अतिरिक्त भी प्रदर्शित करना सीखें।
  • आत्मविश्वास रखे और जब ’’न’’ कहना हो तो ’’न’’ कहने का आनंद लें।

’’ना’’ कहने के तरीके :-

  • नम्रतापूर्वक मना करना।
  • कारण बताकर इंकार करना।
  • अपने इंकार को दुहराना।
  • अपने स्थान से हट जाना।
  • अनसुना करना।
  • ऐसी परिस्थिति में ही न पड़ना जहां अनुचित दबाव हो।
  • ऐसे साथी को ढूंढना जो आपका समर्थन करें।
  • अपनी भावनाओं के बारे में चर्चा करना।
  • साथियों के दबाव के कारण :-
  • समूह में शामिल होने के लिये ।
  • ध्यान आकर्षित करने के लियs
  • प्रसिद्वि या चर्चित होने के लिये
  • दोस्त बनाने के लिये
  • तुरन्त आनंद प्राप्त करने के लिये
  • घर में तथा विद्यालय में उचित स्नेह व प्रशंसा न मिलने पर, इस आवश्यकता की पूर्ति दोस्तों द्वारा करने के लिये।
  • अपने विद्रोही विचारों हेतु श्रोता प्राप्त करने के लिये।
  • अपने विद्रोही विचारों हेतु श्रोता प्राप्त करने के लिये।

साथियों के दबाव में आने के कारण को पहचान कर उसका निषेध करना उचित होता है।