What:  The central govt. , more specifically the Ministry of Human Resource Development (MHRD) along with the National AIDS Control Organization (NACO) collaborated to develop this school-based program on life skills education including comprehensive sexuality education (CSE).

Why:  Well, to address HIV and AIDS situation among young people in the country, given that almost 1/3 of all new HIV infections in the country occur among young people aged 15-24 and to provide life skills education including CSE.

Where: The AEP is taught in all secondary and higher secondary schools, both public and private schools, affiliated with CBSE across the country. Programs based on AEP curriculum are also being implemented by state boards.

Who: The AEP is taught as curricular/ co-curricular adolescence education to students in classes IX-XII and as life skills education to students in classes I-VIII. It is also taught through the open-schooling system as well as through specific initiatives for out-of-school-youth.

When: The AEP was started in 2005. During 2007 it was suspended in several states because there were objections raised by teachers, parents and policy-makers on the content of the AEP as well as the overall need for CSE in India. A parliamentary committee was set up, based on a petition by some parents, to review the need for CSE as well as implementation of AEP across the nation. In the meanwhile NACO along with other partners began the process of revising the AEP curriculum based on the objections raised.  The committee in its final report submitted in 2009 stated that AEP should be withdrawn, pending revision of the curriculum. As of November 2010, the AEP remains suspended in 5 states viz. Uttar Pradesh, Chattisgarh, Madhya Pradesh, Maharashtra & Karnataka. Rajasthan, Gujarat and Kerala had also suspended the program in 2007 but have recently started their own versions of AEP in their respective states.किशोरावस्था शिक्षा कार्यक्रम (एईपी) केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान (नाको), भारत सरकार का एक संयुक्त प्रयास है। इसका मकसद प्रत्येक किशोर/किशोरी (10-19 वर्ष) को एचआईवी संक्रमण से अपना बचाव करने और अपनी प्रजनन एवं यौन स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को सही ढंग से संबोधित कर पाने के लिए वैज्ञानिक सूचना, ज्ञान और जीवन कौशल प्रदान करना है। देश के सभी माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक स्कूलों को एईईपी कार्यक्रम के दायरे में माना गया है। मौजूदा प्रस्तावों के अनुसार कक्षा 9 और कक्षा 11 में यह पाठ्यक्रम नोडल अध्यापकों द्वारा पढ़ाया जाता है और एक अकादमिक सत्र के दौरान इसकी अवधि कम से कम 16 घंटे होनी चाहिए। एईईपी के लिए पारस्परिक, सहभागी और जीवन कौशल आधारित पद्धति अपनाई गई है।

एईपी के मुख्य तत्व:

1.            बढ़ती उम्र के लिए आवश्यक हो जाता है यह समझना

2.            किशोरावस्था प्रजनन एवं यौन स्वास्थ्य में निहित है

3.            मानसिक स्वास्थ्य एवं नशीली दवाओं का सेवन

4.            एचआईवी और एड्स

बुनियादी सिद्धांत

  1. पारस्परिक अध्यापन-शिक्षण प्रक्रिया
  2. विषयवस्तु और प्रक्रिया में जेंडर संवेदीकरण की व्यवस्था
  3. सांस्कृतिक रूप से अनुकूल पद्धतियों और सामग्रियों का प्रयोग
  4. स्वास्थ्य सूचनाओं व सेवाओं के प्रति किशोर-किशोरियों के अधिकारों की मान्यता

एईपी के लक्ष्य और उद्देश्य

लक्ष्य:

1.            मौजूदा सकारात्मक व्यवहार को पुष्ट करने के अवसर मुहैया कराना और उन जीवन निपुणताओं का सुदृढ़ीकरण करना जोकि युवाओं को अपने सामने आने वाली जोखिम भरी परिस्थितियों से निपटने और बचाने में सक्षम बनाती हैं।

2.            ऐसे व्यवहार को बढ़ावा देना जोकि किशोर-किशोरियों को स्वस्थ चुनाव करने के लिए तैयार करे।

3.            युवाओं में एचआईवी के नए संक्रमणों की रोकथाम करना।

एईपी के उद्देश्य:

1.            सभी स्कूल अपने कार्यक्रम में उचित आयु अनुकूल जीवन कौशल आधारित सतत किशोरावस्था शिक्षा का समावेश करें;

2.            जीवन की चुनौतियों से निपटने के लिए किशोर-किशोरियों के ज्ञान व कौशल को बढ़ाने के लिए सुनियोजित शिक्षा दी जाए।

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