So…what is sexuality?

Is it just about sex? Or is it about one’s sexual orientation?

Or is it something more than all of that?

Sexuality is a central aspect of being human, of being you. It is a part of your individuality.  It starts with your body – how you feel about it, your image of yourself. It is about your biological sex and your gender – you may be born as a female but you may identify yourself psychologically and emotionally as a man. It is about who you love and are intimate with – men or women or both. It is about what brings you pleasure, what makes you healthy and happy. It’s about your relationships and the values you bring to them. Sexuality is the sum total of it all and it includes the following dimensions:

-          Sex & reproduction

-          Gender identity & roles

-          Sexual orientation & identities

-          Thoughts, fantasies & desires

-          Eroticism, pleasure & intimacy

-          Individual beliefs, attitudes and values

-          Behaviours, practices and relationships

Everyone is different and unique. We may experience some or all of these dimensions differently and chose to express our sexuality differently. While sexuality is deeply intrinsic to our personality, to who we are and what makes us who we are, it is also influenced by the interaction of other factors such as:

-          Biological & psychological factors

-          Economic factors

-          Political & legal environment

-          Socio-cultural environment & history

-          Ethical, religious and spiritual factors

For instance, something as simple as how we dress in public is determined by our socio-cultural and economic environment.  Most societies restrict the expression of sexuality within certain parameters, often to ‘socially sanctioned’ relationships. There has long been a taboo on talking about sexuality, even sexual health, particularly when it comes to talking to young people about these issues.

Reference:

1. WHO’s Definitions on Gender & Sexual Health

2.  IPPF’s Declaration on Sexual Rightsयौनिकता मनुष्य के जीवनकाल  का एक केंद्रीय आयाम है और इसमें सेक्स, जेंडर पहचानें व भूमिकाएं, यौन प्रवृत्तियां, कामुकता, आनंद, अंतरंगता और प्रजनन, सभी शामिल हैं। यौनिकता व्यक्ति के विचारों, कल्पनाओं, कामनाओं, रवैयों, मूल्य-मान्यताओं, आचरण, व्यवहारों, भूमिकाओं और संबंधों में अनुभव और अभिव्यक्त की जाती है। हालांकि यौनिकता में ये सारे आयाम आ जाते हैं लेकिन ये जरूरी नहीं है कि इन सभी को हमेशा अनुभव या अभिव्यक्त किया जा रहा हो। यौनिकता जैविक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, नैतिक, कानूनी, ऐतिहासिक और धार्मिक व आध्यात्मिक कारकों की अंतर्क्रियाओं से प्रभावित होती है।’

(डब्ल्यूएचओ द्वारा दी गई मसविदा कार्यकारी परिभाषा, 2002)

यौनिकता सिर्फ सेक्स नहीं है । यह जेंडर से भी अलग है। जेंडर का अर्थ है कि विभिन्न समाज स्त्रियों और पुरुषों को किस तरह देखते हैं, उनकी भिन्नताओं को कैसे देखते हैं और उनको किस तरह की भूमिकाएं सौंपते हैं। यौनिकता में बहुत सारे विचार निहित होते हैं और यह एक मनोगत श्रेणी है। यौनिकता की किसी भी परिभाषा में इस विविधता का समावेश बहुत जरूरी है। यही कारण है कि यह परिभाषा उम्मीद से ज्यादा लंबी और ज्यादा जटिल है। यौनिकता की परिभाषा यौनिकता की हमारी समझदारी के साथ-साथ विकसित होती रही है।

हमारी यौनिकता बहुत सारे कारकों को प्रभावित करती है और उनसे प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए, हम यह मानकर नहीं चल सकते कि सभी लोग सेक्स करने या किसी से संबंध बनाने के लिए एक जैसी वजहों से प्रेरित होते हैं। कुछ लोग बच्चे पैदा करने के लिए सेक्स कर सकते हैं जबकि कई दूसरे लोग एक साथी की चाह में एैसा कर सकते हैं।

सभी लोग यौनिकता को समान रूप में अनुभव नहीं करते। अगर हम इन भिन्नताओं के प्रति सचेत हों तो व्यक्तिगत आवश्यताओं को संबोधित करने और लोगों को प्रभावी सेवा उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

(सौजन्य: तारशी – बेसिक्स ऐण्ड बियाँड)

हमारा यौन ज्ञान, विश्वास, रुझान, मूल्य और आचरण हमारी यौनिकता का हिस्सा होते हैं। शरीर रचना, शरीर क्रिया विज्ञान और यौन प्रतिक्रिया तंत्र का जीव रसायन विज्ञान; पहचान, झुकाव, भूमिकाएं और व्यक्तित्व; तथा सोच, भावनाएं और संबंध, ये सभी यौनिकता के विभिन्न आयाम होते हैं। यौनिकता की अभिव्यक्तियां हमारे नैतिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और नीतिशास्त्रीय सरोकारों से प्रभावित होती हैं।

(एसआईईसीयूएस रिपोर्ट, खंड 24, संख्या 3, 1996)

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