Disclaimer: The photographs were shot during Delhi Queer Pride Parade on 27th November 2011. The photo essay is being published online and will be circulated for non-commercial purposes. If your photograph is in the album and you wish to get it removed, please email Rachit Sai Barak at rachitsbarak@gmail.com
मैंने हमेशा सब कुछ जान ने और हर सांसारिक गतिविधि से अवगत रहने को एहमियत दी है . पर जागरूकता की परिभाषा कुछ दायरों में सीमित न रह कर अनेक रूप ले लेती है और यही विचार मुझे सोचने पर मजबूर करता है के अगर परिवर्तन होना चाहिए तो क्या सिर्फ जागरूकता ही काफी है ? और ऐसे ही तमाम सवाल अपने दिल में लिए मैं वाई. पी. फौन्देशन की पहली ‘आम सभा ‘ में गयी .
जैसे ही मैंने प्रवेश किया , मैंने तीन अलग कोनो में अपने जैसे युवाओ को एक समूह में बैठा पाया जहाँ वे तीन अलग विषयो पर विचार विमर्श कर रहे थे और कई लोग यह निर्णय ले पाने में असक्षम थे कि किस समूह में बैठा जाये . एक तरफ मारिया मेहरा ‘वैकल्पिक यौनिक पहचान ‘ पर अपने विचार प्रकट कर रही थीं तो दूसरी तरफ ‘जागोरी ‘ कि प्रभ्लीन टुटेजा ने ‘सुरक्षित स्थल ‘ पर एक रोचक वार्तालाप से सबका ध्यान आकर्षित कर रखा था . ‘निगाह ‘ कि अनुषा हरिहरन ने ‘यौनिक एवं प्रजनन अधिकार ‘ के विषय पर चर्चा को दिलचस्प बनाय रखा.
‘आम सभा ‘ कि शुरुआत एक रोचक आइस – ब्रेकर से की गयी जहाँ हमे अलग अलग समूहों में खड़े हो कर उन शब्दों को जोर से बोलना था जिनको बोलने में हम अक्सर हिचकिचाते हैं . अपनी ज़िन्दगी में आज तक मैंने कभी भी लिंग , योनी या टितनी जैसे शब्द इतनी ऊंची आवाज़ में चीख कर नहीं कहे थे . इन सब के कारण मेरे अन्दर आगे होने वाले क्रियाकलापों को लेकर उत्सुकता काफी बढ़ गयी और मैंने निर्णय लिया के मैं तीनो समूहों में होने वाली चर्चा का हिस्सा बनूंगी .
मारिया मेहरा , जो की एक सक्रिय प्रगतिशील विप्रित्लिंगी महिला हैं , ने हमसे अपनी आँखें बंद करके उनकी आवाज़ को गौर से सुन ने के लिए कहा . उन्होंने हम को बताया के उनकी आवाज़ हमेशा से ही एक औरत जैसी थी और जब वे एक लड़का थीं तो उनकी आवाज़ बाकी लडको की तरह नहीं फटी तथा उनकी आवाज़ में पुरुषो जैसा मध्यम स्वर नहीं आ पाया . हमारी आँखें बंद थीं और उन्होंने हमसे अपने हाथ ऊपर करने के लिए कहा अगर हम तब भी उनको एक पुरुष मानते थे या उनको एक पुरुष होने के योग्य समझते थे . कुछ पल बाद , हम ने अपनी आँखें खोली और देखा के किसी ने भी अपना हाथ ऊपर नहीं किया था और इसी शांत सहमति में मारिया ने चर्चा सत्र प्रारंभ किया . ऐसे समाज में , जहाँ लिंगो के कार्य -भार तथा भूमिका पत्थर की लकीर माने जाते हैं और जहाँ ‘स्त्री ‘ या ‘पुरुष ‘ के लेबल में न आ पाने वाला हर व्यक्ति तिरस्कार एवं उपहास का शिकार हो जाता है , वहां इस सत्र की एहमियत काफी बढ़ जाती है . हमारे वार्तालाप से हमे मारिया जैसे व्यक्तियों के आगे आने वाली कठिनाइयों के बारे में तो पता चला ही साथ ही उनको जिन परेशानियों का सामना करना पड़ता है उसे सुनकर हम सब हैरान थे – वे लोग सार्वजनिक शौचालयों का इस्तेमाल नहीं कर सकते क्योंकि दोनों ही लिंग उनको अपनाने से इंकार करते हैं और उनको सरकारी दस्तावेजों में लिंग भरने में भी जिस कशमकश का सामना करना पढता है उसे सुनकर हम सबको हैरानी भी हुई तथा एक प्रकार से समाज की रूडिवादी विचारधारा पर क्रोध भी आया . जब मारिया ने बताया कि उनको एक नौकरी भर्ती संसथान ने सिर्फ इसलिए अस्वीकृत कर दिया क्योंकि वे ‘अलग ‘ हैं , हम सब भौचक्के रह गए .
दुसरे कोने में , प्रभ्लीन टुटेजा ने ‘सुरक्षित स्थल ‘ पर जब बातचीत शुरू की तो मुझे अपने कई अनुभव याद आ गए और काफी चीज़ें मुझे अपने से सम्बंधित लगीं . कई बार अँधेरा हो जाने पर जानी -पहचानी जगहें भी सुनसान होने के कारण डरावनी लगती हैं और मेरे अन्दर एक अजीब सा डर आ जाता है , शायद इसलिए क्योंकि दिल्ली को औरतो के लिए एक असुरक्षित शहर माना जाता है . हमारे समूह को अनेक समूहों में बांटा गया और सभी को एक किस्म की ‘पहचान ‘ दी गयी , जैसे उत्तर -पूर्वी भारत से आई 20 साल की एक लड़की , 20 साल का लड़का जो पैसे लेकर जा रहा है और ऐसी ही अनेक ‘पहचाने ‘. हम इस निष्कर्ष पर पहुचे के दिल्ली का कोई इलाका कितना सुरक्षित या असुरक्षित है , चाहे वो हमारा गली -मोहल्ला , मंदिर , एय. टी.एम्., पार्क , कॉलेज या सिनेमा हॉल ही क्यों न हो . और इन जगहों की सुरक्षा को अलग अलग पहचानो के हिसाब से भी मापा गया . हमे एहसास हुआ की अलग पहचान के व्यक्तियों को एक परिस्थिति अलग अलग रूप से प्रभावित करती