किशोरावस्था के दौरान होने वाले शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक तथा सामाजिक परिवर्तन
Feb 2011 28

िशोरावस्था वह समय है, जब मानव अपना बचपन छोड़कर जवानी की दहलीज पर कदम रखता है। इस समय बालक और बालिका से युवक और युवती बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। यह 10 से 19 वर्ष की अवस्था है। इस दौरान बहुत सारे परिवर्तन होते है। ये परिवर्तन मस्तिष्क में स्थित पिटयुटरी ग्लेंड के स्त्राव के कारण होता है जो हारमोन्स की क्रियाशीलता के फलस्वरूप है। इन्हीं हार्मोन्स के कारण किशोरावस्था के शारीरिक भावनात्मक व सामाजिक परिवर्तन होते है।

सामान्य तौर पर लड़कियों में 10 से 15 वर्ष की आयु और लड़कोंं में 12 से 16 वर्ष में परिवर्तन प्रारंभ हो जाते है लड़कों में टेस्टीज या वृष्णाग्रंथि से पुरूष हार्मोन्स टेस्टॉस्टरोन और लड़कियों मsa Ovary से एस्ट्रोजन और प्रोजोसट्रोन उत्पन्न होते है।

लड़कियों में शारीरिक परिवर्तन :-

  • अचानक शरीर में विकास :- ऊंचाई और वजन में वृद्धि होती है। कुल्हे बड़े होते हे और कमर पतली होती जाती है। शरीर में स्त्री-सुलभ सुडौलता आ जाती है।
  • प्रजनन अंगों का विकास :- योनि/गर्भाशय में वृद्धि होती है।
  • योनि मार्ग से सफेद चिपचिपे द्रव का स्राव होता है। यह स्वाभाविक है।
  • डिम्बकोस क्रियाशील हो जाता है।
  • मासिक धर्म की शुरूआत ।

द्वितीय लैंगिक गुण :-

  • बगल और जनजांगों के आस-पास बाल उगते है।
  • स्तन बडे और विकसत हो जाते है। उनके आकार से दुग्ध निर्माण प्रणाली का कोई संबंध नहीं होता। कभी-कीाी एक स्तन दूसरे से अधिक बड़ा होता है।
  • आवाज पतली होने लगती है।
  • चेहरे पर मुॅंहासे आने लगते है।

लडकों में शारीरिक परिवर्तन :-

  • शरीर की लंबाइ और वजन में वृद्धि होती है। कंधे चौड़े होते है और स्वायु बढ़ने लगते है।
  • प्रजनन अंगों का विकास।
  • लिंग/शिश्न और अण्डकोष का आकार बढ़ने लगता है। उनमें से एक वृषण सामान्य दूसरे से नीचा होता है जो कि एक सामान्य स्थित है।
  • अण्डकोष में शुक्राणुओं का निर्माण होने लगात है।

द्वितीय लैंगिक गुण :-

  • हाथों, पैरों, बगल में, सीने, चेहरे तथा जननांगों के आसपास वाल आ जाते है।
  • दाढ़ी-मूँछ निकलने लगती है।
  • मुँहासे आते है।
  • आवाज भारी हो जाती है।

किशोरावस्था में मानसिक व भावनात्मक परिवर्तन :-

  • कल्पना में लीन होने जाना तथा स्वप्न देखना।
  • विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण।
  • यौन उत्तेजना की शुरूवात/काम भावनाओं का जागृत होना।
  • चिडचिड़सवप, चंचलता एवं गुस्सा बढ़ जाना।
  • तनाव, झिझक एवं संकोच महसूस करना।
  • उतावलापन और जोखिम उठाने की प्रवृत्ति विकसित होना
  • दोस्तों से प्रभावित होना।
  • इच्छाओं, नैतिकता, मूल्यों में असमंजस्य पैदा होना।
  • माता-पिता एवं अन्य बड़ों से संबंधों में बदलाव।
  • स्वतंत्रता और जिम्मेदारियों में बदलाव।

किशोरावस्था में सामाजिक परिवर्तन :-

  • पारिवारिक संबंधों में घनिष्ठता कम होने लगती है । माता-पिता और किशोर-किशोरियों के बीच दूरी बढ़ जाती है।
  • सभी की रोक-टोक बुरी लगती है।
  • माता-पिता की अपेक्षा दोस्तों या विपरीत लिंग के दोस्तों को अधिक महत्व दिया जाता है।
  • अपनी पसंद और निर्णयोें में अडिग रहना और अपना लक्ष्य निर्धारित करना।
  • पसंदीदा व्यक्ति और दोस्तों के विचार व जीवन शैली से प्रभावित होना।
  • वयस्कों के सामने अपने को आत्मनिर्भर दर्शाने की कोशिश करना।
  • जीवन मूल्यों व आदर्शो के विषय में भ्रमित होना।

किशोरावस्था के दौरान अभिभावकों को अपने बच्चों से दोस्ताना व्यवहार करना चाहिये। उनसे कुछ बिना छिपायें सारी बातों को जो किशोरावस्था के परिवर्तन से संंबंधित है चर्चा करना चाहिये। यह शरीर के विकास की एक स्वभाविक प्रक्रिया है, उन्हें बताना चाहियें। उन्हें अकेले में नहीं रहने देना चाहिये।

इसके अतिरिक्त शरीर की साफ-सफाई और उनके देखभाल की जानकारी देनी चाहिये। शरीर और बेहतर स्वस्थ्य कैसे रहे इसके लिये संतुलित आहार, खेल-कूद व व्यायाम के विषय में ध्यान देना चाहिये।

किशोरावस्था में अपने साथियों का दबाव होता है जिसके चलते उनके समूह में रहने के लिये अपने दोस्तों की आदतों का अनुकरण करना होता है, अत: दोस्तों की बुरी आदतें किशोर-किशोरियों को जोखिम भरे जीवन में ला सकती है अत: साथियों के दबाव से बचना होगा और अपने विवेक व समझदारी का उपयोग करन करना होगा।

अपने साथियों के दबाव में न आना ना कहना सीखे :-

  • अपनी इच्छा एवं आदर्श का सम्मान करें।
  • अपने निर्णय स्वयं ले।
  • अपनी भावनाओं को समझे और उस पर आस्था रखे।
  • दूसरों द्वारा आप पर हावी होने के प्रयास को पहचाने और उससे बचें।
  • अपनी अनिच्छा को शब्दों के अतिरिक्त भी प्रदर्शित करना सीखें।
  • आत्मविश्वास रखे और जब ’’न’’ कहना हो तो ’’न’’ कहने का आनंद लें।

’’ना’’ कहने के तरीके :-

  • नम्रतापूर्वक मना करना।
  • कारण बताकर इंकार करना।
  • अपने इंकार को दुहराना।
  • अपने स्थान से हट जाना।
  • अनसुना करना।
  • ऐसी परिस्थिति में ही न पड़ना जहां अनुचित दबाव हो।
  • ऐसे साथी को ढूंढना जो आपका समर्थन करें।
  • अपनी भावनाओं के बारे में चर्चा करना।
  • साथियों के दबाव के कारण :-
  • समूह में शामिल होने के लिये ।
  • ध्यान आकर्षित करने के लियs
  • प्रसिद्वि या चर्चित होने के लिये
  • दोस्त बनाने के लिये
  • तुरन्त आनंद प्राप्त करने के लिये
  • घर में तथा विद्यालय में उचित स्नेह व प्रशंसा न मिलने पर, इस आवश्यकता की पूर्ति दोस्तों द्वारा करने के लिये।
  • अपने विद्रोही विचारों हेतु श्रोता प्राप्त करने के लिये।
  • अपने विद्रोही विचारों हेतु श्रोता प्राप्त करने के लिये।

साथियों के दबाव में आने के कारण को पहचान कर उसका निषेध करना उचित होता है।

Lessons Learnt
Nov 2011 26

मैंने हमेशा सब कुछ जान ने और हर सांसारिक गतिविधि से अवगत रहने को एहमियत दी है . पर जागरूकता की परिभाषा कुछ दायरों में सीमित न रह कर अनेक रूप ले लेती है और यही विचार मुझे सोचने पर मजबूर करता है के अगर परिवर्तन होना चाहिए तो क्या सिर्फ जागरूकता ही काफी है ? और ऐसे ही तमाम सवाल अपने दिल में लिए मैं वाई. पी. फौन्देशन की पहली ‘आम सभा ‘ में गयी .

जैसे ही मैंने प्रवेश किया , मैंने तीन अलग कोनो में अपने जैसे युवाओ को एक समूह में बैठा पाया जहाँ वे तीन अलग विषयो पर विचार विमर्श कर रहे थे और कई लोग यह निर्णय ले पाने में असक्षम थे कि किस समूह में बैठा जाये . एक तरफ मारिया मेहरा ‘वैकल्पिक यौनिक पहचान ‘ पर अपने विचार प्रकट कर रही थीं तो दूसरी तरफ ‘जागोरी ‘ कि प्रभ्लीन टुटेजा ने ‘सुरक्षित स्थल ‘ पर एक रोचक वार्तालाप से सबका ध्यान आकर्षित कर रखा था . ‘निगाह ‘ कि अनुषा हरिहरन ने ‘यौनिक एवं प्रजनन अधिकार ‘ के विषय पर चर्चा को दिलचस्प बनाय रखा.

‘आम सभा ‘ कि शुरुआत एक रोचक आइस – ब्रेकर से की गयी जहाँ हमे अलग अलग समूहों में खड़े हो कर उन शब्दों को जोर से बोलना था जिनको बोलने में हम अक्सर हिचकिचाते हैं . अपनी ज़िन्दगी में आज तक मैंने कभी भी लिंग , योनी या टितनी जैसे शब्द इतनी ऊंची आवाज़ में चीख कर नहीं कहे थे . इन सब के कारण मेरे अन्दर आगे होने वाले क्रियाकलापों को लेकर उत्सुकता काफी बढ़ गयी और मैंने निर्णय लिया के मैं तीनो समूहों में होने वाली चर्चा का हिस्सा बनूंगी .

मारिया मेहरा , जो की एक सक्रिय प्रगतिशील विप्रित्लिंगी महिला हैं , ने हमसे अपनी आँखें बंद करके उनकी आवाज़ को गौर से सुन ने के लिए कहा . उन्होंने हम को बताया के उनकी आवाज़ हमेशा से ही एक औरत जैसी थी और जब वे एक लड़का थीं तो उनकी आवाज़ बाकी लडको की तरह नहीं फटी तथा उनकी आवाज़ में पुरुषो जैसा मध्यम स्वर नहीं आ पाया . हमारी आँखें बंद थीं और उन्होंने हमसे अपने हाथ ऊपर करने के लिए कहा अगर हम तब भी उनको एक पुरुष मानते थे या उनको एक पुरुष होने के योग्य समझते थे . कुछ पल बाद , हम ने अपनी आँखें खोली और देखा के किसी ने भी अपना हाथ ऊपर नहीं किया था और इसी शांत सहमति में मारिया ने चर्चा सत्र प्रारंभ किया . ऐसे समाज में , जहाँ लिंगो के कार्य -भार तथा भूमिका पत्थर की लकीर माने जाते हैं और जहाँ ‘स्त्री ‘ या ‘पुरुष ‘ के लेबल में न आ पाने वाला हर व्यक्ति तिरस्कार एवं उपहास का शिकार हो जाता है , वहां इस सत्र की एहमियत काफी बढ़ जाती है . हमारे वार्तालाप से हमे मारिया जैसे व्यक्तियों के आगे आने वाली कठिनाइयों के बारे में तो पता चला ही साथ ही उनको जिन परेशानियों का सामना करना पड़ता है उसे सुनकर हम सब हैरान थे – वे लोग सार्वजनिक शौचालयों का इस्तेमाल नहीं कर सकते क्योंकि दोनों ही लिंग उनको अपनाने से इंकार करते हैं और उनको सरकारी दस्तावेजों में लिंग भरने में भी जिस कशमकश का सामना करना पढता है उसे सुनकर हम सबको हैरानी भी हुई तथा एक प्रकार से समाज की रूडिवादी विचारधारा पर क्रोध भी आया . जब मारिया ने बताया कि उनको एक नौकरी भर्ती संसथान ने सिर्फ इसलिए अस्वीकृत कर दिया क्योंकि वे ‘अलग ‘ हैं , हम सब भौचक्के रह गए .
दुसरे कोने में , प्रभ्लीन टुटेजा ने ‘सुरक्षित स्थल ‘ पर जब बातचीत शुरू की तो मुझे अपने कई अनुभव याद आ गए और काफी चीज़ें मुझे अपने से सम्बंधित लगीं . कई बार अँधेरा हो जाने पर जानी -पहचानी जगहें भी सुनसान होने के कारण डरावनी लगती हैं और मेरे अन्दर एक अजीब सा डर आ जाता है , शायद इसलिए क्योंकि दिल्ली को औरतो के लिए एक असुरक्षित शहर माना जाता है . हमारे समूह को अनेक समूहों में बांटा गया और सभी को एक किस्म की ‘पहचान ‘ दी गयी , जैसे उत्तर -पूर्वी भारत से आई 20 साल की एक लड़की , 20 साल का लड़का जो पैसे लेकर जा रहा है और ऐसी ही अनेक ‘पहचाने ‘. हम इस निष्कर्ष पर पहुचे के दिल्ली का कोई इलाका कितना सुरक्षित या असुरक्षित है , चाहे वो हमारा गली -मोहल्ला , मंदिर , एय. टी.एम्., पार्क , कॉलेज या सिनेमा हॉल ही क्यों न हो . और इन जगहों की सुरक्षा को अलग अलग पहचानो के हिसाब से भी मापा गया . हमे एहसास हुआ की अलग पहचान के व्यक्तियों को एक परिस्थिति अलग अलग रूप से प्रभावित करती