<!--:en-->15 things about my sexuality – Part II<!--:--><!--:hi-->किशोरावस्था के दौरान होने वाले शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक तथा सामाजिक परिवर्तन<!--:-->
Feb 2011 28

’15 things about my sexuality’

1) I don’t know what sexuality means. For me its my sexual state of mind. Or of body.

2) I am gay. Lesbian. Bisexual. Trans sexual. Pan sexual and straight. My sexuality changes everyday, hate the above mentioned words, I don’t like labels. I am all of the above and none of the above also. If you can like a different color everyday then why not sexual preference ?

3) I would love to call myself a sexual person even though I haven’t had sex ever. Sexuality and sex are different.

4) I became sexually active when I was 12 , with my first boyfriend. That was my first kiss, I don’t remember how it happened and why it happened.

5) I was molested when I was 15 by my science tutor. I was so upset that I could never tell my parents about it for a month and when I did it was worse. I did not let anyone touch me for 1 year after that.

6) I was in a 5 year long violent relationship with a man I loved – I never had the balls to get out of it, or stand up for myself. I never understood that verbal and physical abuse could mean violence. Now, I wish I go back in time and believe in myself more.

7) Boobs are the best part of my body, its also something people call me.

8) My entire school life till the 11th grade I was called a ‘whore’- because I would speak to guys and date them.

9) I believe in one night stands and I believe in relationships. I have had both, they remain special.

10) I watch porn, I like it. I am very open out it. The sophisticated people call it ‘yuck’. They don’t understand how porn can give you pleasure. Guess what? They don’t NEED to.

11) I believe in sex work. I prostitute my brain in my work place, there is nothing wrong in doing the same with you body.

12) If I get lots of money I will sleep with someone if they are hot and rich- no this isn’t for only money. You need feel pleasure in the work you do. And I like sex, a lot.

13) People try really hard not to judge me, to understand me and then they misinterpret me. Yes, the open minded people too. The open who claim to accept different sexuality and the same ones who talk about it.

14) In my past relationships, both with men and women I have been forced to have sex. But after the incidents mentioned above taught me how to say no.

15) You don’t define how I think, how I look, how I feel. I can think like a girl, look like a boy and feel think about both. I define my sexuality- I make it, change it, feel it, believe it and accept it.

Anonymous, 20, Delhi

िशोरावस्था वह समय है, जब मानव अपना बचपन छोड़कर जवानी की दहलीज पर कदम रखता है। इस समय बालक और बालिका से युवक और युवती बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। यह 10 से 19 वर्ष की अवस्था है। इस दौरान बहुत सारे परिवर्तन होते है। ये परिवर्तन मस्तिष्क में स्थित पिटयुटरी ग्लेंड के स्त्राव के कारण होता है जो हारमोन्स की क्रियाशीलता के फलस्वरूप है। इन्हीं हार्मोन्स के कारण किशोरावस्था के शारीरिक भावनात्मक व सामाजिक परिवर्तन होते है।

सामान्य तौर पर लड़कियों में 10 से 15 वर्ष की आयु और लड़कोंं में 12 से 16 वर्ष में परिवर्तन प्रारंभ हो जाते है लड़कों में टेस्टीज या वृष्णाग्रंथि से पुरूष हार्मोन्स टेस्टॉस्टरोन और लड़कियों मsa Ovary से एस्ट्रोजन और प्रोजोसट्रोन उत्पन्न होते है।

लड़कियों में शारीरिक परिवर्तन :-

  • अचानक शरीर में विकास :- ऊंचाई और वजन में वृद्धि होती है। कुल्हे बड़े होते हे और कमर पतली होती जाती है। शरीर में स्त्री-सुलभ सुडौलता आ जाती है।
  • प्रजनन अंगों का विकास :- योनि/गर्भाशय में वृद्धि होती है।
  • योनि मार्ग से सफेद चिपचिपे द्रव का स्राव होता है। यह स्वाभाविक है।
  • डिम्बकोस क्रियाशील हो जाता है।
  • मासिक धर्म की शुरूआत ।

द्वितीय लैंगिक गुण :-

  • बगल और जनजांगों के आस-पास बाल उगते है।
  • स्तन बडे और विकसत हो जाते है। उनके आकार से दुग्ध निर्माण प्रणाली का कोई संबंध नहीं होता। कभी-कीाी एक स्तन दूसरे से अधिक बड़ा होता है।
  • आवाज पतली होने लगती है।
  • चेहरे पर मुॅंहासे आने लगते है।

लडकों में शारीरिक परिवर्तन :-

  • शरीर की लंबाइ और वजन में वृद्धि होती है। कंधे चौड़े होते है और स्वायु बढ़ने लगते है।
  • प्रजनन अंगों का विकास।
  • लिंग/शिश्न और अण्डकोष का आकार बढ़ने लगता है। उनमें से एक वृषण सामान्य दूसरे से नीचा होता है जो कि एक सामान्य स्थित है।
  • अण्डकोष में शुक्राणुओं का निर्माण होने लगात है।

द्वितीय लैंगिक गुण :-

  • हाथों, पैरों, बगल में, सीने, चेहरे तथा जननांगों के आसपास वाल आ जाते है।
  • दाढ़ी-मूँछ निकलने लगती है।
  • मुँहासे आते है।
  • आवाज भारी हो जाती है।

किशोरावस्था में मानसिक व भावनात्मक परिवर्तन :-

  • कल्पना में लीन होने जाना तथा स्वप्न देखना।
  • विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण।
  • यौन उत्तेजना की शुरूवात/काम भावनाओं का जागृत होना।
  • चिडचिड़सवप, चंचलता एवं गुस्सा बढ़ जाना।
  • तनाव, झिझक एवं संकोच महसूस करना।
  • उतावलापन और जोखिम उठाने की प्रवृत्ति विकसित होना
  • दोस्तों से प्रभावित होना।
  • इच्छाओं, नैतिकता, मूल्यों में असमंजस्य पैदा होना।
  • माता-पिता एवं अन्य बड़ों से संबंधों में बदलाव।
  • स्वतंत्रता और जिम्मेदारियों में बदलाव।

किशोरावस्था में सामाजिक परिवर्तन :-

  • पारिवारिक संबंधों में घनिष्ठता कम होने लगती है । माता-पिता और किशोर-किशोरियों के बीच दूरी बढ़ जाती है।
  • सभी की रोक-टोक बुरी लगती है।
  • माता-पिता की अपेक्षा दोस्तों या विपरीत लिंग के दोस्तों को अधिक महत्व दिया जाता है।
  • अपनी पसंद और निर्णयोें में अडिग रहना और अपना लक्ष्य निर्धारित करना।
  • पसंदीदा व्यक्ति और दोस्तों के विचार व जीवन शैली से प्रभावित होना।
  • वयस्कों के सामने अपने को आत्मनिर्भर दर्शाने की कोशिश करना।
  • जीवन मूल्यों व आदर्शो के विषय में भ्रमित होना।

किशोरावस्था के दौरान अभिभावकों को अपने बच्चों से दोस्ताना व्यवहार करना चाहिये। उनसे कुछ बिना छिपायें सारी बातों को जो किशोरावस्था के परिवर्तन से संंबंधित है चर्चा करना चाहिये। यह शरीर के विकास की एक स्वभाविक प्रक्रिया है, उन्हें बताना चाहियें। उन्हें अकेले में नहीं रहने देना चाहिये।

इसके अतिरिक्त शरीर की साफ-सफाई और उनके देखभाल की जानकारी देनी चाहिये। शरीर और बेहतर स्वस्थ्य कैसे रहे इसके लिये संतुलित आहार, खेल-कूद व व्यायाम के विषय में ध्यान देना चाहिये।

किशोरावस्था में अपने साथियों का दबाव होता है जिसके चलते उनके समूह में रहने के लिये अपने दोस्तों की आदतों का अनुकरण करना होता है, अत: दोस्तों की बुरी आदतें किशोर-किशोरियों को जोखिम भरे जीवन में ला सकती है अत: साथियों के दबाव से बचना होगा और अपने विवेक व समझदारी का उपयोग करन करना होगा।

अपने साथियों के दबाव में न आना ना कहना सीखे :-

  • अपनी इच्छा एवं आदर्श का सम्मान करें।
  • अपने निर्णय स्वयं ले।
  • अपनी भावनाओं को समझे और उस पर आस्था रखे।
  • दूसरों द्वारा आप पर हावी होने के प्रयास को पहचाने और उससे बचें।
  • अपनी अनिच्छा को शब्दों के अतिरिक्त भी प्रदर्शित करना सीखें।
  • आत्मविश्वास रखे और जब ’’न’’ कहना हो तो ’’न’’ कहने का आनंद लें।

’’ना’’ कहने के तरीके :-

  • नम्रतापूर्वक मना करना।
  • कारण बताकर इंकार करना।
  • अपने इंकार को दुहराना।
  • अपने स्थान से हट जाना।
  • अनसुना करना।
  • ऐसी परिस्थिति में ही न पड़ना जहां अनुचित दबाव हो।
  • ऐसे साथी को ढूंढना जो आपका समर्थन करें।
  • अपनी भावनाओं के बारे में चर्चा करना।
  • साथियों के दबाव के कारण :-
  • समूह में शामिल होने के लिये ।
  • ध्यान आकर्षित करने के लियs
  • प्रसिद्वि या चर्चित होने के लिये
  • दोस्त बनाने के लिये
  • तुरन्त आनंद प्राप्त करने के लिये
  • घर में तथा विद्यालय में उचित स्नेह व प्रशंसा न मिलने पर, इस आवश्यकता की पूर्ति दोस्तों द्वारा करने के लिये।
  • अपने विद्रोही विचारों हेतु श्रोता प्राप्त करने के लिये।
  • अपने विद्रोही विचारों हेतु श्रोता प्राप्त करने के लिये।

साथियों के दबाव में आने के कारण को पहचान कर उसका निषेध करना उचित होता है।